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खस्‍ता हाल उद्यमों की हालत सुधारने के उपाय

रोहित कपूर*

कभी ब्‍लू चिप कहे जाने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम जैसे बीएसएनएल, एयर इंडिया, हिंदुस्‍तान केबल्‍स लिमिटेड और भारतीय उर्वरक निगम आज इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि बदलते समय और प्रौद्योगिकी  के साथ अपने को न बदल पाने से उद्यमों का भाग्‍य बदल जाता है और वे खस्‍ता हाल श्रेणी में जा सकते हैं।

किंतु, इस बारे में एक आशा की किरण हमेशा बनी रहती है क्‍योंकि सरकार देश के विकास इंजन को आगे बढ़ाने के लिए अधिकतम संख्‍या में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की हालत सुधारने के लिए अथक प्रयास करती रही है। इन इकाइयों के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाले सहायता पैकेजों की मदद से यह संभव होता है।

इस लक्ष्‍य को ध्‍यान में रख कर सरकार ने दिसंबर 2004 में सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम पुनर्संरचना बोर्ड की स्‍थापना की थी। अन्‍य बातों के अलावा बोर्ड को औद्योगिक और गैर औद्योगिक दोनों ही श्रेणियों के केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के पुनर्गठन/उनकी हालत सुधारने के बारे में सरकार को परामर्श देने का काम सौंपा गया।

उसके बाद से अक्‍तूबर 2012 तक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के करीब 67 खस्‍ता हाल उद्यम बोर्ड को सौंपे जा चुके थे, जिनमें से 62 के बारे में अनुशंसाएं बोर्ड द्वारा की जा चुकी हैं। बोर्ड ने पांच मामले पुनर्विचार के लिए मंत्रालयों को वापस भेजे हैं।

इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं कि 2004 के बाद से इन उद्यमों की समग्र हालत में महत्‍वपूर्ण सुधार हुआ है। मार्च 2005 में खस्‍ता हाल केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की संख्‍या 90 थी जो मार्च 2012 में घट कर 66 रह गई। बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार सरकार ने इन उद्यमों में से 45 के जीर्णोद्धार को मंजूरी दे दी।

बकाया मामलों में से अधिकतर के लिए सरकार की मंजूरी की प्रतीक्षा की जा रही है जबकि हालत सुधारने के लिए स्‍वीकृत 45 उद्यमों में से 14 उद्यमों को फिर से पटरी पर लाने का काम पूरा हो चुका है। इनमें भारत पम्‍प्स एंड कम्‍प्रेशर्स, सीमेंट कार्पोरेशन आफ इंडिया, एचईसी, एंड्रयूयूले और मीकन शामिल हैं जो लाभ कमाने लगी हैं, जबकि अन्‍य उद्यमों के लिए बहाली पैकेजों को लागू किया जा रहा है।

बहाली पैकेज जिन कंपनियों के लिए मंजूर किए गए हैं उनमें हिंदुस्‍तान शिपयार्ड, एचएमटी और स्‍कूटर्स इंडिया शामिल हैं।

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को गतिशील बाजार स्‍थ‍ितियों के अंतर्गत काम करना होता है, इसलिए उनके कार्य निष्‍पादन में उतार चढ़ाव आना स्‍वाभाविक है।

जहां तक केंद्रीय उद्यमों में घाटे और उनके खस्‍ता हाल होने के कारणों का प्रश्‍न है, यह प्रत्‍येक उद्यम की अलग अलग स्थ‍िति पर निर्भर करता है। कुछ मामलों में इसके कारण ऐतिहासिक रहे हैं। ऐसी वस्‍त्र कंपनियों, जिनका सामाजिक-आर्थिक आधारों पर निजी क्षेत्र से अधिग्रहण किया गया था, का आधुनिकीकरण तेजी से नहीं किया जा सका।

इसी प्रकार इंजीनियरिंग और रिफ्रेक्‍टरीज क्षेत्र के उद्यम भी आधुनिक नहीं हो पाए। पिछले वर्षों में पर्याप्‍त जॉब आर्डर न मिल पाने, ऊंची कार्मिक लागत, धन के अभाव, प्रौद्योगिकी अप्रचलित होने, निवेश की लागत ऊंची होने और सस्‍ते आयात से प्रतिस्‍पर्धा के कारण कुछ अन्‍य कंपनियों की हालत भी खस्‍ता हो गई है। इनमें उपभोक्‍ता सामान बनाने वाली कंपनियां और कुछ नई कंपनियां शामिल हैं।

इसके अतिरिक्‍त ज्‍यादातर खस्‍ता हाल और घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की अन्‍य समान समस्‍याओं में ऋण-इक्विटी ढांचे का अभाव, कमजोर विपणन नीतियां और निर्णय करने की धीमी प्रक्रिया शामिल है।

एक नीतिगत उपाय के रूप में 1985 में बीमार औद्योगिक कंपनियां (विशेष प्रावधान) अधिनियम (एसआईसीए) बनाया गया था। 1991 में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को इसके दायरे में लाने का प्रावधान किया गया (जो 1992 से प्रभावी हुआ)। एसआईसीए के प्रावधानों के अंतर्गत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे उद्यम, जिनका समग्र घाटा उनके पंजीकरण की तारीख से कम से कम पांच वर्ष तक उनकी निवल मालियत के बराबर या उससे अधिक हो गया हो,ईआईएफआर को सौंपे जा सकते हैं। पिछले 20 वर्षों -1992 और 2011 के बीच, 63 केंद्रीय उद्यम पीआईएफआर को सौंपे गए हैं।

सरकार ने इन केंद्रीय उद्यमों के घाटे पर काबू पाने के लिए विभिन्‍न नीतिगत उपाय किए हैं।

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के खस्‍ता हाल उद्यमों की हालत सुधारने/उनकी पुनर्संरचना करने की नीतियों के अंतर्गत सरकार द्वारा इक्विटी भागीदारी के रूप में निवेश करने, उन्‍हें ऋण प्रदान करने, ऋण माफ करने आ‍दि उपाय किए जाते हैं। इसके अलावा व्‍यापारिक पुनर्संरचना के उपाय भी किए जाते हैं जिनमें प्रबंधन में बदलाव, केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों में से सक्षम इकाइयों का चयन करके अलग कंपनी बनाना और अक्षम इकाइयों को बंद करना तथा संयुक्‍त उद्यम बनाना, आदि शामिल हैं।

अन्‍य नीतिगत उपायों के अंतर्गत फालतू कार्मिकों की छंटनी और स्‍वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजनाओं के जरिए कार्मिकों की संख्‍या को युक्तिसंगत बनाना शामिल है।

केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों को देश की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ कहा जाता है इसलिए प्रत्‍येक कंपनी का योगदान महत्‍वपूर्ण है और वे सभी राष्‍ट्र निर्माण में समान रूप से भागीदार हैं।

31 मार्च, 2012 को देश में केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों की संख्‍या 200 थी। इन कंपनियों ने करों, शुल्‍कों, ऋणों पर ब्‍याज पर लाभांश के रूप में सरकारी खजाने में 1.6 लाख करोड़ रुपये का योगदान किया जो सरकार की कुल राजस्‍व प्राप्तियों का 21.4 प्रतिशत है।

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लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

अस्‍वीकरण : इस आलेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार स्‍वयं लेखक के हैं और पत्र सूचना कार्यालय का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है।

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