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इस्लामिक बैंक: लाभ और हानि की हिस्सेदारी दोनों की है

रिजवान अलीग गोरखपुर

आज के समय विभिन्न कारणों से इस्लाम सबके दिलो दिमाग पर छाया हुआ है, वो चाहे उसे समझ लेने के कारण अच्छे रूप में या फिर राजनैतिक कारणों या ना समझ पाने के कारण बुरे रूप में।

परन्तु एक बात सत्य है कि इस्लाम से ऐसे लोगों को कितनी भी नफरत हो वह इसे समझने का प्रयास तो कर रहे हैं जो आज के दौर के पहले कभी नहीं की,यही इस्लाम की सबसे बड़ी जीत है। और समझ गये तो उसके सिद्धांत से होने वाले लाभ के कारण उस इस्लामिक सिद्धांत को दिल खोलकर अपना भी लेते हैं, जिसका जीता जागता उदाहरण है “इस्लामिक बैंक” जो भारत की इस्लाम विरोधी सरकार के द्वारा ही भारत में लाया जा रहा है।

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया के गवर्नर उर्जित पटेल हैं और उर्जित पटेल बिना मोदी की आज्ञा के कुछ नहीं करने वाले , रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ने भारत के सभी बैंकों को एक एक काउंटर “इस्लामिक बैंक” के सिद्धांत वाले खाते को खोलने का सुझाव दिया है।

जिस व्यक्ति ने कर्ज़ लेकर कोई व्यवसाय किया है और परिश्रम किया है तो कर्ज़ डूब जाने के कारण भी उसके उस परिश्रम की कीमत उसे मिले ऐसी व्यवस्था इस्लाम में है और वह कीमत उसे कर्ज़ देने वाले से मिलेगी , अर्थात व्यापार में लाभ और हानि की हिस्सेदारी दोनों की है, जो धन को व्यवसाय करने के लिए कर्ज़ दे रहा उसकी भी और जो कर्ज़ लेकर जो परिश्रम कर रहा है उसकी भी।

जबकि आज के “अर्थ” सिद्धांत में कर्ज़ लेकर किए व्यापार में फाएदा हो या नुकसान , बैंक से इसका कोई मतलब नहीं , उसे दिए क़र्ज का पूरा का पूरा पैसा चाहिए वो भी ब्याज के साथ। कर्ज़ लेने वाला चाहे आत्महत्या ही क्यूँ ना कर ले।

क्या है इस्लामिक बैंक का सिद्धांत-

इस्लाम कर्ज़ के लेनदेन में ब्याज़ की उपस्थिति के ही ख़िलाफ़ है और इसलिए है क्योंकि ब्याज के सिद्धांत पर बनी व्यवस्था में समाज के सभी लोगों के पैसे कुछ पूँजीपतियों के हाथ में आ जाते हैं , जैसे भारत में 5% लोगों के पास देश का 90% धन है और बाकी लोगों के पास देश का 5% धन है।

इस्लामिक बैंक की व्यवस्था समझिए-

इस्लामिक बैंकिंग पूंजी के आदान-प्रदान के खिलाफ नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ खास नियमों एवं सिद्धातों का पालन करना होता है।

इस्लामिक बैंक के बचत खाते पर ब्याज की कोई नीति नहीं है, लेकिन जब बचत खाते में पड़े पैसे के प्रयोग से लाभ होता है तो आपको उपहारों के रूप में बैंक कुछ ना कुछ देता है परन्तु यह फिक्स नहीं होता बल्कि मिले लाभ पर निर्भर रहता है।

इस्लामिक बैंकिंग में अनैतिक कार्यों जैसे शराब, जुआ और पोर्नोग्रफी में निवेश करने की अनुमति नहीं है। यानी, इस्लामिक सिद्धांत के बैंक ऐसे व्यवसाय के लिए कोई वित्तीय मदद नहीं करते.

चुँकि इस्लाम में ब्याज पर पैसे देने की मनाही है। इस्लामिक बैंक किसी को भी उसकी अच्छी क्रेडिट के आधार पर लोन देता है और कर्ज लेने वाले को सिर्फ मूलधन यानी जितनी रकम ली है उतनी ही लौटानी पड़ती है। यानी, लोन पर ब्याज नहीं लिया जाता।

इस्लामिक कानून में कर्ज़ देने वाले और कर्ज लेकर उसका इस्तेमाल करने वाले, कर्ज़ लेकर किए व्यापार में दोनों का समान रिस्क होता है। यानी, पैसे डूबने पर सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ कर्ज लेने वाले की ही नहीं होती है।

वैसे तो इस्लामिक बैंकिंग कई देशों में प्रचलित है और स्टैंडर्ड चार्टर्ड जैसा बैंक इस्लामिक बैंकिंग को अपनाकर शाखा या एक प्रोजेक्ट के रूप में खाता खोल रहे हैं। ऐसे ऐसे देश इस इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था को अपने यहाँ लागू कर रहे हैं जो अपने नागरिकों पर इस्लाम धर्म के फ़र्ज करने पर रोक लगाते रहे हैं और उनमें एक प्रमुख देश चीन भी है।

हॉन्गकॉन्ग ऐंड शंघाई बैंकिंग कॉर्पोरेशन अपने पंरपरागत बैंकिंग ऑपरेशन के साथ इस्लामिक बैंकिंग को भी चला रहे हैं।

भारत में इसी वर्ष 21 सितम्बर 2016 को लोकमंगल बैंक की “बार्सी” शाखा जो ज़िला सोलापुर (महाराष्ट्र) देश की पहली बैंकिंग शाखा खुल गयी है और इस्लामिक बैंकिंग सेवा शुरू हुई।

सऊदी अरब के “जेद्दा” के इस्लामिक डेवेलपमेंट बैंक (आईडीबी) की शाखा प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में खुलने जा रही है।

इस्लामिक बैंक वह उदाहरण है कि राजनैतिक कारणों से कोई इस्लाम से कितनी ही घृणा करे परन्तु यदि इमानदारी से उसने इसका अध्ययन कर लिया तो वह इसकी एक ना एक दिन इज़्ज़त ज़रूर करेगा।

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